Monday, 30 August 2010

यूँ ही

यूँ ही यकीन कर लिया
कुछ बात और है
या मैं बदल गयी हूँ
या निगाहें जनाब की
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कल तक तो शिकायत थी
रंजिश भी, गिला भी
क्यूँ आज मेहरबान है
तबियत जनाब की
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कहते हैं भूल जाओ
उस बेबस सी रात को
मांगे न मिल सकी थी
इनायत जनाब की
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लाख ज़र्द,उजड़ी सी
फिरती हो मुहब्बत
पाएगी न पनाह ये
वफ़ा में जनाब की
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अच्छा है चार दिन
ये कहानी है दोस्तों
आफत है, मुसीबत है
वजिहत जनाब की
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अब सोचती हूँ
उम्र भर एक फासला रहे
दो दिन की दूरियां
तो हैं आदत जनाब की