Saturday, 3 July 2010

कुछ तो आराम है

कुछ तो आराम है अज़ाबे- ला-इलाज में
वक़्त की नब्ज़ बड़े गौर से पढी मैंने

तुझको भी अज़ल से जगा पाया
रात कल तेरी निगाहों में बसर की मैंने

तू मेरे साथ चलेगा, इस तसल्ली के लिए
कितनी शिद्दत से कभी कोई दुआ की मैंने

दिल को मुझपर यकीन भी हो कैसे
दिल की मर्ज़ी से कहाँ उम्र गुज़र की मैंने

हसरतें जीस्त की मक्नूं है इन्ही नज्मों में
अपनी हर नज़्म तुझे आज नज़र की मैंने

3 comments:

शांताराम खामकर said...

nice..1

agar marathi janti ho to welcome on my blog

राकेश कौशिक said...

बहुत खूब

Dr.J.P.Tiwari said...

दिल को मुझपर यकीन भी हो कैसे
दिल की मर्ज़ी से कहाँ उम्र गुज़र की मैंने


SANDHYAA JI KAHAN SE LATI HAIN AAP MAI TO YAHI KAHUNGA
कैसे करती शब्द श्रृंगार तुम?
यह विरह कहाँ से लाती हो?
रहस्य रोमांच का सृजन कैसे?
पल भर में तुम कर जाती हो.

कभी लगती हो तुतलाता बच्चा,
कभी किशोर बन जाती हो,
क्षण भर में तु रूप बदलती कैसे?
कैसे कुलांच भर जाती हो?