Wednesday, 26 May 2010

शिमला

आज सुबह तो हुई
पर दिन नहीं निकला
करारी सर्दी है
और अजब बदगुमानी भी

धुंधलाई खिड़की को पोंछा तो
बगीची का देओदार साफ़ हो गया
मुझे ठिठुरता देख
डालियों में उलझा एक पुराना मंज़र
दबे पाँव कमरे में उतर आया

तुम भी नीला मुफ्फ्लेर ओढ़े
जाने किस मिजाज़ में चले आये
क्या सचमुच कुछ नहीं बदला
या बस मीठी सी रौशनी में
कल और आज का फर्क गुम हो गया

एक प्याली चाय
और बुझती अंगीठी की ओट
एक माफात मुहब्बत जीने में
पूरी दुपहरी गुज़र गयी
या सिर्फ एक उम्र ?

जो भी हो
कुछ देर में माल रोड पर भीड़ उतर आएगी
रिज की सुनहरी बतियान सुलग उठेंगी
और ये शाम मेरे ख्याल में वापस सिमट जाएगी
तुम गहराते कोहरे में खो जाओगे
और मैं तुम्हारी तपिश साँसों में सहेजे
घर चली आऊँगी

बीते हर साल का सिला
एक मौसम में कहाँ मिलता है
ये तो चलता रहेगा
सर्द दौर पहाड़ों पर फिर लौटेगा
और किसी मोड़ पे वो देओदार
बाहों में धुप को उलझाए
यूँ ही रिस्ता रहेगा

2 comments:

Dr.J.P.Tiwari said...

एक प्याली चाय
और बुझती अंगीठी की ओट
एक माफात मुहब्बत जीने में
पूरी दुपहरी गुज़र गयी
या सिर्फ एक उम्र ?

bahut khoob ek pankti wah sabkuchh kh diya jise mere jaise log ek poore page me kah pate hain. aapki kalam me bahut prtibha hai . sambhalkr aur sahej kr rakhiyega. bahut se chor uchchakke ghoom rahen hain. likhti rahen . mai samay se nahin padg pata hun. kyoki jahan rahta hun wahan net ki suvidha km hai. students line lagaye rahte hain. ghar pr ji jab saptah me 1-2 bar aata hun , tabhi baith pata hun.

Sandhya Nair said...

Dhanyawaad Tiwariji..aapki prashansa se bahut protsahan milta hai parantu aapki kehni se sehmat nahi hoon...aapki abhivyakti to mujhse kahin shresth hai..main to aapse bahut kuch seekhti hoon aur seekhna chahti hoon, aapki kavita,aapki sameeksha se sadaiv kuch naya sochne ki prerna milti hai
sadar naman