Wednesday, 12 May 2010

गहरी आँखों में

गहरी आँखों में उतर आई है
खूब ये राहते तनहाइ है
ज़ख्म जमने लगा है सीने में
जान हर दौर गुज़र आई है

अपना मिलना कहाँ ज़रूरी था
सोचता हूँ ,सबब नहीं मिलता
वो रजामंद ही रहा होगा
जिसकी मर्ज़ी से चोट खायी है

ये जो रंजिश है आज मेरा नसीब
अब ये ज़िल्लत भी लुत्फ़ देती है
आप से बात चली थी मेरी
बज़्म तक आज चली आई है

नेक दिल है, बेईमान फितरत
कौन से मर्ज़ का करू चारा
भूल जाता हूँ कभी आपका ग़म
फिर कभी आपकी याद आई है









3 comments:

Anonymous said...

achchi kavita hai par urdu shabd samajh aane mein takleef hoti hai..aap hindi tatha urdu blog alag kardein to badi meherbani hogi

Dr.J.P.Tiwari said...
This comment has been removed by the author.
Dr.J.P.Tiwari said...

'नफरत-इर्ष्या', 'राग-द्वेष' सब, नकारात्मक अनुराग की खाई है,कैसे पाटोगे ..तुम ....इसको.., ...क्या कोई ..युक्ति .....लगाईं ...है?

अनुराग से ही फिर भर सकता यह, चाहे जितनी चौड़ी खाई हो.फिर तुम चुप क्यों....बैठे मेरे भैया?, क्यों ....अब देर ...लगाईं है .