Wednesday, 12 May 2010

तारीख

आज सुबह जब तारीख बदली
कुछ जानी पहचानी लगी
मानो पहले सा हो सब..

अजब सा मन हुआ
सोचा पुरानी सब तसवीरें
फर्श पर बिखरा दूं
और दिन भर ढूंढूं तुम्हे
किसी ठहरी हुई सी सांस में
या हंसकर,तारीख के बहाने से
मना लूं तुमको

फिर याद आया
तुम रूठे कहाँ हो?
तुम तो बस बदल गए हो
तारीख की तरह...

1 comment:

Dr.J.P.Tiwari said...

यह कोरी कल्पना नहीं हो सकती.एक भोग हुआ यथार्थ जैसा है. परन्तु है बड़ा ही मनोवैज्ञानिक. रूठे को तो मनाया जा सकता है परन्तु जो नजर फेर ले, बदल जाय, बेवफा हो जाय, उसके लिए क्या कहा जा सकता है. यह तो बेवफाई है.. दुःख तो होता है परन्तु यह अच्छा भी है क्योकि पहचान जल्दी हो गयी कही बहुत देर में होती तो क्या होता? जीवन बर्बाद होता. परिवर्तन में जो कुछ भी बदलता है, कहीं न कहीं श्रेयष्कर ही होता है. इस बात को समझ लिया जाय तो दर्द की पीड़ा कम हो जाएगी.

अपनी अपनी किस्मत है. ये कौन समेट पाता है कितना /
जितनी बड़ी पात्रता जितनी, वह समेट पाता है उतना //