Thursday, 11 March 2010

कुछ देर हुई , एक युद्ध हुआ

कुछ देर हुई एक युद्ध हुआ
धुन्धला धुन्धला परिणाम रहा
एक और जुता था अर्ध प्रेम
एक और पूर्ण अभिमान रहा

मेरा सब कुछ था दाव लगा
हारूं जीतूँ का प्रश्न कहाँ
हारूं तो प्रेम विहीन जियूं
जीतूँ तो प्रेम विभीस्त सहूँ

सम्मान की आहत अभिलाषा
कल आशा से बढ़कर पूर्ण हुई
पर जब बदली उसने परिभाषा
कारण विनाश का मूल बनी

संध्या के इस अंधियारे में
पहचान सकेगा कौन भला
कोमल सहमा सा ये चेहरा
तुम हो, या है प्रतिबिम्ब मेरा

कुछ देर हुई एक युद्ध हुआ
धुन्धला धुन्धला जिसका परिणाम
वो सूर्य क्षितिज पर ठहरा है
या रक्त रंजित एक पूर्ण विराम