Monday, 30 August 2010

यूँ ही

यूँ ही यकीन कर लिया
कुछ बात और है
या मैं बदल गयी हूँ
या निगाहें जनाब की
-
कल तक तो शिकायत थी
रंजिश भी, गिला भी
क्यूँ आज मेहरबान है
तबियत जनाब की
-
कहते हैं भूल जाओ
उस बेबस सी रात को
मांगे न मिल सकी थी
इनायत जनाब की
-
लाख ज़र्द,उजड़ी सी
फिरती हो मुहब्बत
पाएगी न पनाह ये
वफ़ा में जनाब की
-
अच्छा है चार दिन
ये कहानी है दोस्तों
आफत है, मुसीबत है
वजिहत जनाब की
-
अब सोचती हूँ
उम्र भर एक फासला रहे
दो दिन की दूरियां
तो हैं आदत जनाब की

Saturday, 3 July 2010

कुछ तो आराम है

कुछ तो आराम है अज़ाबे- ला-इलाज में
वक़्त की नब्ज़ बड़े गौर से पढी मैंने

तुझको भी अज़ल से जगा पाया
रात कल तेरी निगाहों में बसर की मैंने

तू मेरे साथ चलेगा, इस तसल्ली के लिए
कितनी शिद्दत से कभी कोई दुआ की मैंने

दिल को मुझपर यकीन भी हो कैसे
दिल की मर्ज़ी से कहाँ उम्र गुज़र की मैंने

हसरतें जीस्त की मक्नूं है इन्ही नज्मों में
अपनी हर नज़्म तुझे आज नज़र की मैंने

Wednesday, 26 May 2010

शिमला

आज सुबह तो हुई
पर दिन नहीं निकला
करारी सर्दी है
और अजब बदगुमानी भी

धुंधलाई खिड़की को पोंछा तो
बगीची का देओदार साफ़ हो गया
मुझे ठिठुरता देख
डालियों में उलझा एक पुराना मंज़र
दबे पाँव कमरे में उतर आया

तुम भी नीला मुफ्फ्लेर ओढ़े
जाने किस मिजाज़ में चले आये
क्या सचमुच कुछ नहीं बदला
या बस मीठी सी रौशनी में
कल और आज का फर्क गुम हो गया

एक प्याली चाय
और बुझती अंगीठी की ओट
एक माफात मुहब्बत जीने में
पूरी दुपहरी गुज़र गयी
या सिर्फ एक उम्र ?

जो भी हो
कुछ देर में माल रोड पर भीड़ उतर आएगी
रिज की सुनहरी बतियान सुलग उठेंगी
और ये शाम मेरे ख्याल में वापस सिमट जाएगी
तुम गहराते कोहरे में खो जाओगे
और मैं तुम्हारी तपिश साँसों में सहेजे
घर चली आऊँगी

बीते हर साल का सिला
एक मौसम में कहाँ मिलता है
ये तो चलता रहेगा
सर्द दौर पहाड़ों पर फिर लौटेगा
और किसी मोड़ पे वो देओदार
बाहों में धुप को उलझाए
यूँ ही रिस्ता रहेगा

Wednesday, 12 May 2010

तारीख

आज सुबह जब तारीख बदली
कुछ जानी पहचानी लगी
मानो पहले सा हो सब..

अजब सा मन हुआ
सोचा पुरानी सब तसवीरें
फर्श पर बिखरा दूं
और दिन भर ढूंढूं तुम्हे
किसी ठहरी हुई सी सांस में
या हंसकर,तारीख के बहाने से
मना लूं तुमको

फिर याद आया
तुम रूठे कहाँ हो?
तुम तो बस बदल गए हो
तारीख की तरह...

गहरी आँखों में

गहरी आँखों में उतर आई है
खूब ये राहते तनहाइ है
ज़ख्म जमने लगा है सीने में
जान हर दौर गुज़र आई है

अपना मिलना कहाँ ज़रूरी था
सोचता हूँ ,सबब नहीं मिलता
वो रजामंद ही रहा होगा
जिसकी मर्ज़ी से चोट खायी है

ये जो रंजिश है आज मेरा नसीब
अब ये ज़िल्लत भी लुत्फ़ देती है
आप से बात चली थी मेरी
बज़्म तक आज चली आई है

नेक दिल है, बेईमान फितरत
कौन से मर्ज़ का करू चारा
भूल जाता हूँ कभी आपका ग़म
फिर कभी आपकी याद आई है









Thursday, 11 March 2010

कुछ देर हुई , एक युद्ध हुआ

कुछ देर हुई एक युद्ध हुआ
धुन्धला धुन्धला परिणाम रहा
एक और जुता था अर्ध प्रेम
एक और पूर्ण अभिमान रहा

मेरा सब कुछ था दाव लगा
हारूं जीतूँ का प्रश्न कहाँ
हारूं तो प्रेम विहीन जियूं
जीतूँ तो प्रेम विभीस्त सहूँ

सम्मान की आहत अभिलाषा
कल आशा से बढ़कर पूर्ण हुई
पर जब बदली उसने परिभाषा
कारण विनाश का मूल बनी

संध्या के इस अंधियारे में
पहचान सकेगा कौन भला
कोमल सहमा सा ये चेहरा
तुम हो, या है प्रतिबिम्ब मेरा

कुछ देर हुई एक युद्ध हुआ
धुन्धला धुन्धला जिसका परिणाम
वो सूर्य क्षितिज पर ठहरा है
या रक्त रंजित एक पूर्ण विराम