Tuesday, 21 October 2008

नवल प्रेम की अनुभूति


तुम में ,मुझ में जो अन्तर हैं
ये अन्तर व्याकुल करते है
ये बनकर द्वंद विचारों में
कितना कोलाहल करते है
रह्ती हूँ मैं बस विस्मित सी
क्यूँ हो कर स्पष्ट नही होती
ये नवल प्रेम की अनुभूति

तुम चंचल हो कुछ आतुर भी
क्षण मातृ में हो कर लिप्त किसी
कहते हो कुछ भी,ऐसे ही
कुछ भी तो इसमे सत्य नही
संवेदन से है हीन सभी
ये नवल प्रेम की अनुभूति

तुम फिर मुझसे आगे बढ़कर
जीवन गति से मिल जाते हो
और बाँध विवेचन के बांधे
मैं रह जाती हूँ आहात सी
बनती है मानो व्यंग कोई
यह नवल प्रेम की अनुभूति