Monday, 23 June 2008

ज़िक्र

क्या किसी और को भी दिखती है

तेरी पेशानी पे वो लकीर मेरी

या बस खुशफहम दिल की हसरत है

के तुझ में बाकी, मेरा भी कुछ निशाँ राहे

रश्के बख्त मंज़ूर नही ,जो मेरे बशीर कों

मुर्शिद बना मुझे ,के तुझसे कोई गुनाह हो

मेरी पहचान में फिर शरीक है तू

पाक दाग-ऐ- मुहब्बत बन कर

दीनी में तेरी ,मेरा भी कोई ज़िक्र रहे

फिर चाहे इल्मे ज़लालत बन कर

10 comments:

अमिताभ said...

very nice !!

Amit K. Sagar said...

बहुत खूब. अच्छा लिख रही हैं आप. लिखते रहिए. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर

Ajay Singh said...

ज़ुबां से बोलु तो लगे दुआ की तरह।
इस तरह की हो सुख़न इबादत बनकर।

P. C. Rampuria said...

मुर्शिद बना मुझे ,के तुझसे कोई गुनाह हो
बहुत सुन्दर.. ठन्डी हवा के झोंके कि तरह....

शुभकामनाएं

सागर नाहर said...

बहुत बढ़िया..
हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, आप हिन्दी में बढ़िया लिखें और खूब लिखें यही उम्मीद है।

एक अनुरोध है कृपया यह वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें,तो बढ़िया होगा यह टिप्पणी करते समय बड़ा परेशान करता है।

॥दस्तक॥
तकनीकी दस्तक
गीतों की महफिल

Raji Chandrasekhar said...

स्वागत है, आप का ।
मैं मलयलम का एक ब्लोगर, थोड़ा थोड़ा हिन्दी में भी ।

Manasi said...

लकीरों की कहानियो में कैद है ये जिंदगी मेरी
एक लकीर से निकली तो दूसरी में सिमटी
फैला बीच में दायरों का समुन्दर
मिले कैसे साँसों में दबी चाहतओं से मुक्ति
लकीरों की कहानियो में कैद है ये जिंदगी मेरी
एक लकीर से निकली तो दूसरी में सिमटी

Bhuwan said...

मुहब्बत के समुन्दर में बनती हैं लहरों की लकीरें अनगिनत
साहिल की मेहमां नहीं हैं हद्द-ऐ-सुमुन्दर की हकीकत

haryashwa said...

It touched the soul.

Dr.J.P.Tiwari said...

उस नज़र की तरफ़ मत देखो ......
जो आपको देखने से इन्कार करती है .......
दुनिया की भीड मे उस नज़र को देखिये ......
जो सिर्फ आप का इन्तेज़ार करती है....