Wednesday, 25 June 2008

तौबा

हैं सारे ग़लत देखो अंदाज़ मेरे
जिन्हें सीखने में ज़माने लगे हैं
जो पहुंचे है हम आज बज्म-ऐ-उश्शक में
मेरे रहनुमा बाज़ आने लगे है

तेरी अफ्त का तो खुदाया यकीन है
मेरी आज़मायिश मगर और ही है
तू बख्शेगा रहमत आकिबत के आगे
मेरी मुश्किलें आज है और अभी है

वो हाकिम मेरा मुझसे यूँ रूबरू है
मेरी हर खता आज लगती बला है
तू आदिल ,मुहाफिज़ मेरी नफस का पर
मेरी नज़्म का तो यहीं इंतहान है


बज्म= महफिल, उश्शक= प्रेमी, अफ्त= दया, आकिबत= आखरी मकाम ,अन्तिम पड़ाव
हाकिम= जज,मुहाफिज़ =रक्षक,नफस= रूह













4 comments:

pawanchandan said...

उर्दू के शब्‍द सर के ऊपर से निकल जाते हैं
इनके हिन्‍दी अर्थ साथ में दे दिया करो तो अच्‍छा रहेगा। धन्‍यवाद

Sandhya Nair said...

hindi arth daal diye hai

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