Wednesday, 25 June 2008

तौबा

हैं सारे ग़लत देखो अंदाज़ मेरे
जिन्हें सीखने में ज़माने लगे हैं
जो पहुंचे है हम आज बज्म-ऐ-उश्शक में
मेरे रहनुमा बाज़ आने लगे है

तेरी अफ्त का तो खुदाया यकीन है
मेरी आज़मायिश मगर और ही है
तू बख्शेगा रहमत आकिबत के आगे
मेरी मुश्किलें आज है और अभी है

वो हाकिम मेरा मुझसे यूँ रूबरू है
मेरी हर खता आज लगती बला है
तू आदिल ,मुहाफिज़ मेरी नफस का पर
मेरी नज़्म का तो यहीं इंतहान है


बज्म= महफिल, उश्शक= प्रेमी, अफ्त= दया, आकिबत= आखरी मकाम ,अन्तिम पड़ाव
हाकिम= जज,मुहाफिज़ =रक्षक,नफस= रूह













Monday, 23 June 2008

ज़िक्र

क्या किसी और को भी दिखती है

तेरी पेशानी पे वो लकीर मेरी

या बस खुशफहम दिल की हसरत है

के तुझ में बाकी, मेरा भी कुछ निशाँ राहे

रश्के बख्त मंज़ूर नही ,जो मेरे बशीर कों

मुर्शिद बना मुझे ,के तुझसे कोई गुनाह हो

मेरी पहचान में फिर शरीक है तू

पाक दाग-ऐ- मुहब्बत बन कर

दीनी में तेरी ,मेरा भी कोई ज़िक्र रहे

फिर चाहे इल्मे ज़लालत बन कर