Friday, 21 March 2008

अशोक का उद्धार

समीक्षक का प्रशन

हे अशोक के वृक्ष सुघन
कह दो मुझसे कुछ सजल नयन
वैदेही जब तेरी छाँव रही
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

रावण सीता हर लाया था
सारी सृष्टि थी उबल पड़ी
हुआ प्रलय का नाच प्रचंड
कैसे बीते तुझ पर वो क्षन

रवि का क्रोध महान हुआ
और चार पहर अंगार बहे
झुलसे थे सारे जीवित जन
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

मेघ श्याम जलधि गंभीर
विद्युत ने खींची वक्र लकीर
अश्व्गति से सौ दूनी
धरती की और क्रुद्ध गामन
क्या तू कांपा था साथ विपन
हो जाता ठूंठ विफल जीवन
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

अशोक का उत्तर:
मैं जल जाता था निश्चय ही
पर अद्भुत ऐसा खेल हुआ
मुझ पुष्प विहीन तरु से ही
सीता को इतना स्नेह हुआ
पहली पल्लवी का आगमन
सीता के कोमल अरुण चरण
तन हरित हुआ,और द्रवित था मन
ऐसे बीते मुझ पर वो क्षण

जो चंद्रप्रिया माधुर्य भरी
सीता के निर्मल अंग पडी
मेरे अहोभाग्य कितने
मेरे पल्लव से चिटकी थी
मैंने पायी रघुवीर शरण
ऐसे बीते मुझ पर वो क्षण

जब प्रेमाकुल हो वैदेही
विराहगीत दुहराती थी
उसके करूं काव्य से
भीगी मेरी ही छाती थी
प्रिया मिलन की धुन जब
सीता सुध हर लेती थी
मैं भी हो जाता प्रेम मगन
ऐसे बीते मुझ पर वो क्षण

जो मूक न होता तौ कहता
सीता मैं तेरा जाया हूँ
हे मात,मैं निपट अभागा था
अब आँगन प्रिया कहलाया हूँ
नाम अशोक मैं धारा हूँ
पर दुःख हरती थी तुम मेरे
हर क्षण में मेरे तुम्हे नमन
ऐसे बीते मेरे वो क्षण
ऐसे बीते मेरे वो क्षण