Wednesday, 30 January 2008

क्या शेष रहा

आज शुष्क समीक्षा के अंतर से
कुछ करुना ब्रिंद फिर उभर पड़े
श्याम श्वेत कुछ रंग तेरे
विस्मृत हो कर भी निखर पड़े

विकार हमारे बन्धन के
सब आज बिखर कर ध्वस्त हुए
और स्मृति के अधरों पर रूठे
बस प्रेम प्रसंग समस्त रहे


सब कुछ धूमिल सा जान पड़ा
क्या ध्येह तेरा क्या द्वेष मेरा
बस क्षीण ह्रदय को पुलकित कुछ
आभासों का ही स्मरण रहा

गुण दोष का अब कुच्छ स्मरण नही
परित्याग का भी भय रहा नही
अब प्रसंग शेष वही जिन के
कुछ अर्थ शेष भी रहे नही

है जीवन का अब सत्य यही
हर क्षण में विस्तृत सानिध्य नही
जिस क्षण में प्रेम अगाध रहा
अब संसग्रित शुन्य स्थान कोई

अतीत के हर क्षण से मेरे
अनुरागी मन को है प्रेम रहा
मेरे संस्मरण में हे प्रियवर
प्रेमाकुल तेरा चित्र रहा.

7 comments:

Manasi said...

akhir ke 3 paragraphs totally amazing hain... kiski hai ye khoobsurat kavita ? vajpayee ?

Sandhya Nair said...
This comment has been removed by the author.
govind said...

shabdo ki uttam abhivyakti badhai govindparik@gmail.com

ashvaghosh said...

kuch shesh nahi kavita purn ha ashvaniaugust@gmail.com

संदीप said...

अच्‍छा लिखा है...

पता नहीं आपने लिखा है या किसी और की कविता पोस्‍ट की है, यह स्‍पष्‍ट नहीं हो सका..


लेकिन बेहद विनम्रता के साथ एक बात कहना चाहता हूं,

कि ये कविताएं आपकी हैं तो इनमें काफी पहले की यानी पुरानी-सी हिंदी का प्रयोग किया गया है, जो आज के समय में उतना अपनापन महसूस नहीं कराती जितनी आज की हिंदी, उम्‍मीद है आप मेरी बात समझ गई होंगी..


यदि और किसी की कविताएं पोस्‍ट की गई हैं, यानी पुराने कविओं की तो चयन अच्‍छा है, लेकिन इस चयन और वैरायटी दे सकें तो अच्‍छा रहेगा..


यह एक humble suggestion हैं

Sandhya Nair said...

Thanks Sandip
Kavitayen sab meri likhi hui hain aur aap theek kehte hai, shaili aur bhasha donon puraani hai. koshish karoongi ke kuch behtar aur spasht likh sakoon ...
take care:)
Sandhya

Dr.J.P.Tiwari said...

सब कुछ धूमिल सा जान पड़ा
क्या ध्येह तेरा क्या द्वेष मेरा
बस क्षीण ह्रदय को पुलकित कुछ
आभासों का ही स्मरण रहा

गुण दोष का अब कुच्छ स्मरण नही
परित्याग का भी भय रहा नही
अब प्रसंग शेष वही जिन के
कुछ अर्थ शेष भी रहे नही