Thursday, 31 January 2008

असमंजस

मैं क्यों मिथ्या आव्हान करूं
किस देव में अपना ध्यान धरूं
पर-लक्ष्य को रक्त से सींच कर
इस जग के हठ का मान करूं

मैं क्यूँकर कुछ संकोच करूं
क्यों उन्मत मन को शांत करूँ
क्यों मुझे प्रिय जो अनुग्रह है
उस अनुग्रह का अपमान करूं

क्यों लाज मात्र से हो परिमित
अनुमोदन का उल्लास करूँ
क्यों स्वयं से अपरिचित रह कर
अनजाने घाट का ज्ञान धरूं

क्यों धैर्य मुझे संतप्त करे
क्यों स्वयं से कुछ न प्रशन करूँ

जीवित हूँ ,जीवन के विस्मय में
अपना भी कुछ बलिदान करूं

Wednesday, 30 January 2008

क्या शेष रहा

आज शुष्क समीक्षा के अंतर से
कुछ करुना ब्रिंद फिर उभर पड़े
श्याम श्वेत कुछ रंग तेरे
विस्मृत हो कर भी निखर पड़े

विकार हमारे बन्धन के
सब आज बिखर कर ध्वस्त हुए
और स्मृति के अधरों पर रूठे
बस प्रेम प्रसंग समस्त रहे


सब कुछ धूमिल सा जान पड़ा
क्या ध्येह तेरा क्या द्वेष मेरा
बस क्षीण ह्रदय को पुलकित कुछ
आभासों का ही स्मरण रहा

गुण दोष का अब कुच्छ स्मरण नही
परित्याग का भी भय रहा नही
अब प्रसंग शेष वही जिन के
कुछ अर्थ शेष भी रहे नही

है जीवन का अब सत्य यही
हर क्षण में विस्तृत सानिध्य नही
जिस क्षण में प्रेम अगाध रहा
अब संसग्रित शुन्य स्थान कोई

अतीत के हर क्षण से मेरे
अनुरागी मन को है प्रेम रहा
मेरे संस्मरण में हे प्रियवर
प्रेमाकुल तेरा चित्र रहा.